Saturday, August 11, 2018

नफ़रत..!

#रूस_के_जासूस_का_भारत_को_तोड़ने_वाले_भारतियों_का_पर्दाफाश

दूध तो आप सभी मित्रों ने ज़िन्दगी में कभी उबाला होगा और यह भी अनुभव किया होगा कि आप खड़े खड़े दूध के उबलने का इंतज़ार कर रहे हैं और फिर आपका ध्यान जरा सा चूका कि दूध अचानक से उबल कर बर्तन से बाहर। फिर करते रहिये साफ़ सफाई और सुनते रहिये दुनियाभर की बातें।
आज जो कांवरियों पर, गौरक्षकों पर, दलितों के मुद्दों पर , अल्संख्यकों के मुद्दों पर, जेएनयू में अचानक से उबाल नज़र आ रहा है वो एक दिन, एक महीने, एक साल या एक दशक की कहानी नहीं है। उसकी पतीली गैस पर आज़ादी मिलने के दिन से ही चढ़ा दी गयी थी।

यूरी बेज़मैनोव रूस का एक जासूस था जिसे इन्दिरा गाँधी की सरकार के दौरान केजीबी के एजेंट के रूप में भारत भेजा गए था। इंदिरा गाँधी तक को इस बात की भनक नहीं थी कि दुभाषिये के रूप में य जासूस है। एक अमेरिकन टीवी को अपने इंटरवयू में बेज़मैनोव बताता है कि उसकी टीम को भारत में "#यूज़फुल_इंडियन_इडियट्स का ब्रैनवॉश करके वामपंथी आइडियोलॉजी वाला गैंग तैयार करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी थी।
उन्हें रसूखदार व्यक्तियों, भारतीय मीडिया से जुड़े व्यक्तियों, फिल्मकारों , शिक्षा जगत से जुड़े बुद्धिजीवियों, अहंकारी और सनकी व्यक्तियों जिनके कोई आदर्श और नीतियाँ न हों ऐसे लोगों को भर्ती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था।
उदाहरण के लिए , सुमित्रा नन्दन पंत जिन्होंने " Rhapsody To Lenin" लिखी थी , इस कारण उन्हें रशिया आमंत्रित किया गया , जिसका पूरा खर्च रूस की सरकार ने वहन किया था। #लिंक में सुमित्रा नंदन पंत जिस सभा में खड़े हो कर कुछ कह रहे हैं हैं उनकी मेज पर शराब की बोतलें नज़र आ रहीं है। इन शराब की बोतलों की तरफ इशारा करते हुए बेज़मैनोव कहता है कि मेहमानों की जागरूकता और जिज्ञासा को मारने का यह एक तरीका था। केजीबी के कार्यों में एक मुख्य कार्य मेहमानों को हमेशा नशे में धुत्त रखना होता था। जैसे ही कोई मेहमान मास्को एयरपोर्ट पर उतरता था उसे मेहमानों के लिए बनाये गए विशिष्ट कक्ष में ले जाया जाता था और दोस्ती के नाम पर एक जाम होता था। एक गिलास वोदका फिर दूसरा गिलास वोदका और कुछ ही समय में मेहमान को दुनिया गुलाबी नज़र आने लगती थी। और 10-15 दिन जब तक मेहमान रशिया में रहता था तब तक उन्हें इसी हालत में रखा जाता था।
आगे यूरी बेज़मैनोव बताता है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेस्सरों ,वामपंथी और वामपंथ की तरफ झुकाव रखने वाली पार्टियों , लेखकों, कवियों, भारतीय मीडिया , समाचार पत्रों, नक्सलवादियों और माओवादियों को आज़ादी के बाद से ही रूस वामपंथी आइडियोलॉजी को भारत में फ़ैलाने के लिए फंडिंग करता चला आ रहा है।
अपने अभियान के पहले चरण में उन्होंने जेएनयू और डीयू के प्रोफेसरों से दोस्ती की। दुसरे चरण में ये इन प्रोफेसरों को इंडो सोवियत फ्रेंडशिप सोसाइटी की बैठक में बुलाते थे। इन मीटिंग्स का पूरा खर्च सोवियत सरकार वहन करती थी। इन प्रोफेसरों को यकीं दिलाया जाता था कि वे बहुत गंभीर और विलक्षण किस्म के बुद्धिजीवी हैं। जबकि भावना इसके बिलकुल विपरीत होती थी। उन्हें बुलाया इसलिए जाता था क्योंकिवे " यूज़फुल इडियट्स" होते थे और वे सोवियत संघ द्वारा पढ़ाई गयी पट्टी को बहुत एकाग्र चित से कंठस्थ करके भारत आते थे और फिर अपने द्वारा पढ़ाये जाने वाले हर विद्यार्थी को वामपंथ की वही पट्टी दशकों तक पढ़ाते थे। (जरा सोचिये --जेएनयू की निवेदिता मेनन क्या इसी श्रेणी में तो नहीं आतीं ???)
बेज़मैनोव के अनुसार भारत के वामपंथ, लेफ्टविंग मीडिया छदमबुद्धिजीवियों, लेखकों और पत्रकारों को इस समय पाकिस्तान की आई इस आई पोषित और संचालित कर रही है। जो लोग सोवियत और आईएसआई की विचारधारा को आगे बढ़ाते हैं उन्हें मीडिया के शोर और फ़र्ज़ी जनमत के आधार पर महत्वपूर्ण पदों पर बिठा दिया जाता है। और जो इनकी विचारधारा का समर्थन नहीं करते उनकी या तो हत्या कर दी जाती है या चरित्र हनन करके उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा जाता।
किसी दिन बेज़मैनोव की आत्मा को भारत के के खिलाफ इन षड्यंत्रों ने जगा दिया और वे इनसे दरकिनार होने के लिए भूमिगत हो गए। भारत सरकार ने उनकी गुमशुदगी के विज्ञापन छपवाए जिससे जब वे मिल जाएँ तो उन्हें रूस सरकार के सुपुर्द कर दिया जाए। लेकिन बेज़मैनोव को मालूम था की यदि वे पकडे गए तो रूस की सरकार उन्हें मरवा देगी इसलिए वे चुप कर कनाडा चले गए जहाँ उन्होंने कुछ टीवी इंटरव्यू दिए जिनमे से एक का अंश यह है।
बेज़मैनोव का मानना था कि यदि भारत में स्थिति सुधारनी है तो आज इसी वक़्त से शिक्षा प्रणाली और व्यवस्था बदलनी होगी तब कहीं अगले 20-25 सालों में बदलाव आना शुरू होगा।
परन्तु जैसा कि उन्हें अंदेशा था रूस की सरकार ने उन्हें ज्यादा मुंह खोलने का  दिया और हत्या करवा दी।

https://rightlog.in/2017/04/russian-spy-yuri-bezmenov-conspiracy-01/

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
अब आपको समझ आया कि रात में हुई घटना में सुबह पीड़ित की जाति कैसे छप जाती है ?? अब आपको पता चला कि जुनैद , पहलु खान , अख़लाक़ , गौरी लंकेश तो महीनो भर सुर्ख़ियों में छाते हैं लेकिन प्रशांत पुजारी को कोई नहीं पूछता। अब आपको पता चला कि कठुआ पर फ़िल्मी अदाकाराओं के पेट में दर्द क्यों होता है मंदसौर और बाड़मेर पर क्यों नहीं होता ??? अब आपको पता चला कि रोहिंगिया मुसलमानों पर सुप्रीम कोर्ट को दर्द क्यों होता है लेकिन पकिस्तान से आये हुए प्रताड़ित हिन्दू शरणार्थियों को जबरदस्ती वापिस भेजने पर किसी की आह नहीं निकलती ??? अब आपको मालूम पड़ा कि सेना पर पत्थर फेंकने वालों के खिलाफ पेलेट गईं चलने की मनाही क्यों होती है और उन पर से केस क्यों वापिस हो जाते है और कांवरियों पर अटोर्नी जनरल और सुप्रीम कोर्ट क्यों एक साथ चिल्ला पड़ते है ??? अब आपको पता चला कि बँगाल में और केरल में हिन्दुओं की हत्यायों पर चर्चा क्यों नहीं होती और अलवर का आदतन गौतस्कर रक्बर खान क्यों पूरा सिस्टम हिला देता है ???? अब आपको पता चला कि ईसाई चर्चों और मदरसों में बलात्कारों की ख़बरें कैसे छुप जातीं हैं और सिर्फ हिन्दुओं की ख़बरें कैसे हफ़्तों तक चलायी जातीं हैं ???
इसके लिए मीडिया और देशद्रोही ताकतें जितनी जिम्मेदार हैं उतने ही है हमारे बीच में फैले हुए useful idiots भी जिम्मेदार हैं जो अपनी वृहदमानस्किता दिखाने के फेर में इन षड्यंत्रकारियों के साथ खड़े हो कर उनका मनोबल बढ़ाते हैं या कुछ ऐसे भी हैं जैसे आज एक मित्र की कांवरियों पर ( दो भाई अपने माँ बाप को काँवर में ले जा रहे हैं)वाली पोस्ट एक तूचिये यदुवंशी की टिपण्णी देखी कि " जिनके पास कोई काम नहीं होता वो काँवर ले कर जाते है। "
https://shivashaurya.blogspot.com/2018/08/blog-post.html
#

Thursday, August 9, 2018

समुदाय विशेष! कैसी धर्मनिरपेक्षता?

प्रशासन में व्याप्त धिम्मी लक्षण :-
"हम अपनी ही मौत का सामान ले चले,,,, खुशी खुशी,,,," यह पंक्ति मुझे तब याद आयी जब एक इलेक्शन पार्टी का नम्बर उस बूथ पर आया जहाँ अतिसंवेदनशील वातावरण रहता है और उस बूथ पर हरेक सरकारी नुमाइंदा पिटकर आता है,,,, कारण वहाँ 100% जनसंख्या देश के सबसे लाडले समुदाय की है। वे थैले, बिस्तर, मतपेटियां, कांधे पर लादे,,, जब वाहन में बैठ रहे थे, सबकी निगाहें उन पर ऐसी टिकी थी मानो कुछ निरीह पशुओं को बूचड़खाने की ब्लेड की तरफ धकेला जा रहा है,,,,!!
जब भी कोई नियम कायदा लादना हो, शांतिप्रिय समुदाय को तुरंत, छूट दी जाती है। मतलब,,, आलम यह है कि उनकी बात आते ही, अपने आप, स्वतः स्फूर्त तरीके सब कुछ बिछता चला जाता है।
क्या ही तो ये, भाग्य #लिखवाकर लाये हैं?
कई बार आश्चर्य होता है,,,?
कहीं यह #चमत्कार तो नहीं, उनके देवताओं का,,,, कि एक साथ हिंदुओं की बुद्धि मरोड़ दी जाती है और एक के बाद #अनुकूलताएं आती ही बनती ही चली जाती हैं।
यह सब धिम्मी प्रभाव के कारण है।
वर्षों तक किये गए तुष्टीकरण और पीढ़ियों तक हुए अत्याचारों के कारण, आज हिंदुओं के डीएनए में ही यह बात स्थापित हो गई है,,, कि बात जब उनकी आए तो चुपचाप करते चलो, कौन लफड़े में फंसे,, जब सब कुछ उनके फेवर में है तो मैं अपना भविष्य क्यों दांव पर लगाऊँ,,,, कि हिन्दू तो है ही मरने कटने के लिए,,,, कि जब डीजी वणजारा तक सुरक्षित नहीं तो मेरी क्या औकात है?,,,, और बुरी बात यह है कि धिम्मिग्रस्त मनुष्य को हम समझा भी नहीं सकते।
यह एक बीमार मानसिकता में जीने की दशा है। उनके जाल में राजी खुशी फँसने जैसा,,,,,
उसे जब समझाया जाएगा तो वह मानवता और सद्भाव के ऐसे खूबसूरत तर्क लेकर बैठ जाएगा, बड़े बड़े राष्ट्रवादी भी उनकी संगति से बीमार पड़ जाएं और उनके जैसा ही आचरण करने लगें।
ऐसे में दस-बीस रुपयों की लालच के सहारे, अपने परिवार का "उज्ज्वल भविष्य" देखने वाले, भ्रष्ट, रिश्वतखोर, कामचोर, सरकारी नुमाइंदों से यह अपेक्षा करना कि वे संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार की मूल भावना के अनुरूप काम करते रहेंगे,,,, एक मिथ्या कल्पना ही है।
@Unkonwn

Friday, August 3, 2018

परीक्षा या संयम की परीक्षा!

एक राज्य से दूसरे राज्य भेजने का क्या मतलब..!
रेलवे ग्रुप C के परीक्षार्थी कटिहार पूर्णिया मधेपुरा सुपौल हरसा इत्यादि जिला के छात्र पंजाब,केरल उड़ीसा परीक्षा देने जाएे, यह षड्यंत्र है हम तो कहते है दुबई भेज देते,बेहतर  होता  !मोदी जी क्या  यही  अच्छे  दिन  हैं छात्रों का ?
समस्या यहीं  ख़त्म नहीं होगा  छात्रों का अब जो भूपेंद्र नारायण  मंडल यूनिवर्सिटी  में प art2 और प art3 में नामांकित  है उनका  परीक्षा  भी 7 अगस्त  से शुरू हो रहा है !  जैसे  की कुछ छात्रों के पार्ट 2 का  परीक्षा  30अगस्त को ख़त्म होना  है और उससे  एक दिन पहले  29 अगस्त को रेलवे  का परीक्षा है क्या यह  संभव  है की  वे   इंदौर  मध्यप्रदेश  से 29 अगस्त को परीक्षा देकर  पुनः  30 अगस्त को k p कॉलेज  मुरलीगंज  मधेपुरा वापस  आकर  परीक्षा दे  पाएंगे  ? आज सवाल  मोदी जी से नहीं करूँगा  मैं मुझे उनसे  कोई  गिला  शिकवा  नहीं मुझे शिकायत  उन  नौजवान  साथियों से है जो भक्ति  में लीन  होकर  इस प्रकार  अगर  कोई केंद्र  सर्कार और मोदी जी के खिलाफ  कुछ लिखता है तो मेरे अपने साथी अभद्र  भाषाओँ  का प्रयोग  करने लगते  हैं !
साथियों केंद्र  सर्कार के इस नियत  और नीति  को समझने  की आवस्यकता  है जो छात्रों को तंग  और परेशान ही कर रही हैं ! वादा  2 करोड़  रोज़गार  देने  का हुआ  थ सां आप खुद  अनुभव  करें क्या ऐसा  हुआ ?
और आप इसी  रेलवे फॉर्म को भरने  में हुई  कठनाई  अन्य  फॉर्म और परीक्षा में भी इसी प्रकार छात्रों को परेशान किया जा रहा है !

  मुझे लगता है, गरीब छात्र को खुन बेचकर परीक्षा देने जाना होगा, 400 रू नहीं देते  रेल मंत्रीजी, तो सही था, अब मौहाली पँहुच कर अाने में 3000-4000 ₹ चाहिऐ, जो कि गरीब छात्र के लिए इतना पैसा कहाँ से आएगा
इससे पहले भी सभी रेलवे बोर्डों का सम्मिलित परीक्षा हुई है जो कि परीक्षार्थी के होम स्टेट में ही सेंटर दिया जाता था सभी ट्रेनों में आरक्षित सीटों में लंबी वेटिंग लिस्ट अभी से ही दिखाई दे रही है !

 यह रेल मंत्री का सोची समझी साजिश है कि दूर सेंटर रहने पर छात्र परीक्षा में सम्मिलित नहीं हो पाएंगे और रेलवे बोर्ड को ₹400 लौटाना नहीं पड़ेगा

 इस वैकेंसी के शुरुआत से ही छात्रों को आंदोलन करना पड़ा है अभ्यर्थी से पहले ₹500 भी दिया गया बाद में पुनः नोटिफिकेशन आया कि ₹400 परीक्षा के बाद लौटा दिया जाएगा फिर छात्रों ने आंदोलन किया ग्रुप D से ITI को हटाने के लिए फिर नोटिफिकेशन आया ITI को हटाया गया!

Wednesday, August 1, 2018

मनुस्मृति : दुष्प्रचार खण्डन।

#मनुस्मृति... पूरा लेख अवश्य पढ़े..

मनुस्मृति, मनुवाद के बारे में फैली तमाम भ्रांतियों को दूर करने के लिये इस लेख को अवश्य पढ़ें..... मनु कहते हैं-

 जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं।
 वर्तमान दौर में ‘मनुवाद’ शब्द को नकारात्मक अर्थों में लिया जा रहा है। ब्राह्मणवाद को भी मनुवाद के ही पर्यायवाची के रूप में उपयोग किया जाता है। वास्तविकता में तो मनुवाद की रट लगाने वाले लोग मनु अथवा मनुस्मृति के बारे में जानते ही नहीं है या फिर अपने निहित स्वार्थों के लिए मनुवाद का राग अलापते रहते हैं। दरअसल, जिस जाति व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को दोषी ठहराया जाता है, उसमें जातिवाद का उल्लेख तक नहीं है ।

क्या है ? मनुवाद :
जब हम बार-बार मनुवाद शब्द सुनते हैं तो हमारे मन में भी सवाल कौंधता है कि आखिर यह मनुवाद है क्या ?
महर्षि मनु मानव संविधान के प्रथम प्रवक्ता और आदि शासक माने जाते हैं। मनु की संतान होने के कारण ही मनुष्यों को मानव या मनुष्य कहा जाता है।
अर्थात मनु की संतान ही मनुष्य है। सृष्टि के सभी प्राणियों में एकमात्र मनुष्य ही है जिसे विचारशक्ति प्राप्त है। मनु ने मनुस्मृ‍ति में समाज संचालन के लिए जो व्यवस्थाएं दी हैं, उसे ही सकारात्मक अर्थों में मनुवाद कहा जा सकता है।

 मनुस्मृति :
समाज के संचालन के लिए जो व्यवस्थाएं दी हैं, उन सबका संग्रह मनुस्मृति में है। अर्थात मनुस्मृति मानव समाज का प्रथम संविधान है, न्याय व्यवस्था का शास्त्र है। यह वेदों के अनुकूल है। वेद की कानून व्यवस्था अथवा न्याय व्यवस्था को कर्तव्य व्यवस्था भी कहा गया है। उसी के आधार पर मनु ने सरल भाषा में मनुस्मृति का निर्माण किया। वैदिक दर्शन में संविधान या कानून का नाम ही धर्मशास्त्र है।

महर्षि मनु कहते है-
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। यदि वर्तमान संदर्भ में कहें तो जो कानून की रक्षा करता है कानून उसकी रक्षा करता है। कानून सबके लिए अनिवार्य तथा समान होता है।

 मनु ने भी कर्तव्य पालन पर सर्वाधिक बल दिया है। उसी कर्तव्यशास्त्र का नाम मानव धर्मशास्त्र या मनुस्मृति है। आजकल अधिकारों की बात ज्यादा की जाती है, कर्तव्यों की बात कोई नहीं करता। इसीलिए समाज में विसंगतियां देखने को मिलती हैं।
मनुस्मृति के आधार पर ही आगे चलकर महर्षि याज्ञवल्क्य ने भी धर्मशास्त्र का निर्माण किया जिसे याज्ञवल्क्य स्मृति के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी काल में भी भारत की कानून व्यवस्था का मूल आधार मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति रहा है। कानून के विद्यार्थी इसे भली-भांति जानते हैं। राजस्थान हाईकोर्ट में मनु की प्रतिमा भी स्थापित है।

मनुस्मृति में दलित विरोध :

मनुस्मृति न तो दलित विरोधी है और न ही ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देती है। यह सिर्फ मानवता की बात करती है और मानवीय कर्तव्यों की बात करती है।
मनु किसी को दलित नहीं मानते।
दलित संबंधी व्यवस्थाएं तो अंग्रेजों और आधुनिकवादियों की देन हैं। दलित शब्द प्राचीन संस्कृति में है ही नहीं। चार वर्ण जाति न होकर मनुष्य की चार श्रेणियां हैं, जो पूरी तरह उसकी योग्यता पर आधारित है।
प्रथम ब्राह्मण, द्वितीय क्षत्रिय, तृतीय वैश्य और चतुर्थ शूद्र।
वर्तमान संदर्भ में भी यदि हम देखें तो शासन-प्रशासन को संचालन के लिए लोगों को चार श्रेणियों- प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में बांटा गया है। मनु की व्यवस्था के अनुसार हम प्रथम श्रेणी को ब्राह्मण, द्वितीय को क्षत्रिय, तृतीय को वैश्य और चतुर्थ को शूद्र की श्रेणी में रख सकते हैं।
जन्म के आधार पर फिर उसकी जाति कोई भी हो सकती है। मनुस्मृति एक ही मनुष्य जाति को मानती है। उस मनुष्य जाति के दो भेद हैं। वे हैं पुरुष और स्त्री। 

 मनु की व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण की संतान यदि अयोग्य है तो वह अपनी योग्यता के अनुसार चतुर्थ श्रेणी या शूद्र बन जाती है।
ऐसे ही चतुर्थ श्रेणी अथवा शूद्र की संतान योग्यता के आधार पर प्रथम श्रेणी अथवा ब्राह्मण बन सकती है।

हमारे प्राचीन समाज में ऐसे कई उदाहरण है, जब व्यक्ति शूद्र से ब्राह्मण बना। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुरु वशिष्ठ महाशूद्र चांडाल की संतान थे, लेकिन अपनी योग्यता के बल पर वे ब्रह्मर्षि बने।
एक मछुआ (निषाद) मां की संतान व्यास महर्षि व्यास बने। आज भी कथा-भागवत शुरू होने से पहले व्यास पीठ पूजन की परंपरा है।
विश्वामित्र अपनी योग्यता से क्षत्रिय से ब्रह्मर्षि बने। ऐसे और भी कई उदाहरण हमारे ग्रंथों में मौजूद हैं, जिनसे इन आरोपों का स्वत: ही खंडन होता है कि मनु दलित विरोधी थे।

ब्राह्मणोsस्य मुखमासीद्‍ बाहु राजन्य कृत:।
उरु तदस्य यद्वैश्य: पद्मयां शूद्रो अजायत। (ऋग्वेद)

अर्थात ब्राह्णों की उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से, भुजाओं से क्षत्रिय, उदर से वैश्य तथा पांवों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई। दरअसल, कुछ अंग्रेजों या अन्य लोगों के गलत भाष्य के कारण शूद्रों को पैरों से उत्पन्न बताने के कारण निकृष्ट मान लिया गया,
जबकि हकीकत में पांव श्रम का प्रतीक हैं। ब्रह्मा के मुख से पैदा होने से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति या समूह से है जिसका कार्य बुद्धि से संबंधित है अर्थात अध्ययन और अध्यापन। आज के बुद्धिजीवी वर्ग को हम इस श्रेणी में रख सकते हैं।
भुजा से उत्पन्न क्षत्रिय वर्ण अर्थात आज का रक्षक वर्ग या सुरक्षाबलों में कार्यरत व्यक्ति।
उदर से पैदा हुआ वैश्य अर्थात उत्पादक या व्यापारी वर्ग। अंत में चरणों से उत्पन्न शूद्र वर्ग।

 यहां यह देखने और समझने की जरूरत है कि पांवों से उत्पन्न होने के कारण इस वर्ग को अपवित्र या निकृष्ट बताने की साजिश की गई है, जबकि मनु के अनुसार यह ऐसा वर्ग है जो न तो बुद्धि का उपयोग कर सकता है, न ही उसके शरीर में पर्याप्त बल है और व्यापार कर्म करने में भी वह सक्षम नहीं है। ऐसे में वह सेवा कार्य अथवा श्रमिक के रूप में कार्य कर समाज में अपने योगदान दे सकता है। आज का श्रमिक वर्ग अथवा चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मनु की व्यवस्था के अनुसार शूद्र ही है। चाहे वह फिर किसी भी जाति या वर्ण का क्यों न हो।

 वर्ण विभाजन को शरीर के अंगों को माध्यम से समझाने का उद्देश्य उसकी उपयोगिता या महत्व बताना है न कि किसी एक को श्रेष्ठ अथवा दूसरे को निकृष्ट। क्योंकि शरीर का हर अंग एक दूसरे पर आश्रित है। पैरों को शरीर से अलग कर क्या एक स्वस्थ शरीर की कल्पना की जा सकती है ? इसी तरह चतुर्वण के बिना स्वस्थ समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

ब्राह्मणवाद की हकीकत :

ब्राह्मणवाद मनु की देन नहीं है। इसके लिए कुछ निहित स्वार्थी तत्व ही जिम्मेदार हैं। प्राचीन काल में भी ऐसे लोग रहे होंगे जिन्होंने अपनी अयोग्य संतानों को अपने जैसा बनाए रखने अथवा उन्हें आगे बढ़ाने के लिए लिए अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया होगा।

मनु तो सबके लिए शिक्षा की व्यवस्था अनिवार्य करते हैं। बिना पढ़े लिखे को विवाह का अधिकार भी नहीं देते, जबकि वर्तमान में आजादी के 70 साल बाद भी देश का एक वर्ग आज भी अनपढ़ है।
मनुस्मृति को नहीं समझ पाने का सबसे बड़ा कारण अंग्रेजों ने उसके शब्दश: भाष्य किए। जिससे अर्थ का अनर्थ हुआ। पाश्चात्य लोगों और वामपंथियों ने धर्मग्रंथों को लेकर लोगों में भ्रांतियां भी फैलाईं। इसीलिए मनुवाद या ब्राह्मणवाद का हल्ला ज्यादा मचा।
अंग्रेज जानते थे भारतीय सँस्कृति को खत्म करना है, तो मनु स्मृति खत्म करो । किसी देश को खत्म करना है तो उसका संविधान खत्म कर दो । अतः भारतीय सँस्कृति को खत्म करने हेतु अंग्रेजो ने मनु स्मृति दूषित कर खत्म कर दी।

मनुस्मृति या भारतीय धर्मग्रंथों को मौलिक रूप में और उसके सही भाव को समझकर पढ़ना चाहिए। विद्वानों को भी सही और मौलिक बातों को सामने लाना चाहिए। तभी लोगों की धारणा बदलेगी।
दाराशिकोह उपनिषद पढ़कर भारतीय धर्मग्रंथों का भक्त बन गया था। इतिहास में उसका नाम उदार बादशाह के नाम से दर्ज है। फ्रेंच विद्वान जैकालियट ने अपनी पुस्तक ‘बाइबिल इन इंडिया’ में भारतीय ज्ञान विज्ञान की खुलकर प्रशंसा की है।

पंडित, पुजारी बनने के लिये ब्राह्मण होना जरूरी है :

पंडित और पुजारी तो ब्राह्मण ही बनेगा, लेकिन उसका जन्मगत ब्राह्मण होना जरूरी नहीं है। यहां ब्राह्मण से मतलब विद्वान व्यक्ति से है न कि जातिगत।
 आज भी सेना में धर्मगुरु पद के लिए जातिगत रूप से ब्राह्मण होना जरूरी नहीं है बल्कि योग्य होना आवश्यक है।

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम।

क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च। (10/65)

महर्षि मनु कहते हैं कि कर्म के अनुसार ब्राह्मण शूद्रता को प्राप्त हो जाता है और शूद्र ब्राह्मणत्व को। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न संतान भी अन्य वर्णों को प्राप्त हो जाया करती हैं। विद्या और योग्यता के अनुसार सभी वर्णों की संतानें अन्य वर्ण में जा सकती हैं। #copy


Tuesday, July 31, 2018

असम .. घुसपैठियों से प्रेम या वोटों की राजनीति

#क्योंकि

"एक भी घुसपैठिया कहीं नहीं जाएगा.... लिख लो!!!"

क्योंकि... जो लोग मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के बाद अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लें उनके शत्रु उनसे क्या भयभीत होंगे??? और भयभीत नहीं होंगे तो क्यों जाएंगे???

एक सरकार के तौर पर ४० लाख लोगों की नागरिकता की पहचान ही बहुत बड़ी बात है। उनके वापस भेजने की प्रक्रिया में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अड़ंगे हैं जो नकारात्मक बुद्धिजीवी समझते हुए भी बताएंगे नहीं.... बस #डोकरी_प्रलाप करेंगे।

सरकार ने एक कदम आगे बढ़कर अपने हिसाब से निर्णय लिया है जो स्वागत योग्य है।
एक समाज के नाते सरकार और प्रधानमंत्री की आलोचनाओं से इतर आपने अपने कर्तव्य का निर्वाह कितना किया????

कोई भी मुसलमान घुसपैठिया बिना लोकल मुस्लिमों के सपोर्ट से किसी नगर में टिक नहीं सकता है।
आपने इनके मददगार अपने देश के मुस्लिमों की सूची तैयार तो कर रखी होगी, है ना???😎
इस सूची को आपने एजेंसियों को भी प्रेषित कर दिया होगा, है ना ???😎
इस सूची में शामिल उन लोगों का आर्थिक बहिष्कार भी एक समाज के तौर पर आप कर ही रहे हैं, है ना ???😎

जर्मनी में तीन चार साल पहले ३१ दिसंबर की रात को पार्टी करके लौट रही कुछ युवतियों के कपड़े फाड़ दिए थे सीरिया के शरणार्थियों ने। तर्क यह था कि ,"इस्लाम के अनुसार औरत यदि ढंकी हुई नहीं है तो फिर वो सार्वजनिक है।"
एंजेला मर्केल की घिग्घी बंध गई थी। किंतु हिटलर के समर्थक राष्ट्रवादियों ने जर्मनी के गुंडों को अपने साथ लिया और जहां मुसलमान नजर आए ठोकना और उनकी महिलाओं को बेइज्जत करना शुरू कर दिया।
आज जर्मनी में ज्यादा फड़ फड़ नहीं कर रहे हैं।

आपके पास भी अघोषित सेना है। आपने रोहिंग्या समस्या से निपटने के लिए उनसे संपर्क कायम तो कर लिया है, है ना???😎

हम सब तो बहुत कुछ कर रहे हैं। बल्कि सबकुछ कर रहे हैं। ये मोदी ही कुछ नहीं कर रहे हैं।😬

देख लेंगे २०१९ में..... है ना 😉

#अज्ञेय

Monday, July 30, 2018

एक क़दम.... महाशक्ति की ओर.

#शह_और_मात_की_कूटनीतिक_बिसात

#भारत_का_रवांडा_के_रास्ते_सुरक्षित_कल_की_ओर_आज_के_निश्चित_कदम

#नोट - पोस्ट लंबी है समय होने पर ही आगे बढ़ें !!

सन 2016 में ग्लोबल फुटप्रिंट्स नेटवर्क द्वारा एक रिपोर्ट बनाइ गयी , इस रिपोर्ट के अनुसार 2016 के पहले 7 महीनों में ही हमने अपने हिस्से के सालभर के मूल्य जितने प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग कर लिया था। उनके आँकलन के मुताबिक हर तीस साल या उससे कुछ ज्यादा समय में विश्व की आबादी दोगुनी हो जाती है। भारत की जनसंख्या में जिस तेजी से वृद्धि हो रही है, उसको देखते हुए इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि भविष्य में स्थिति और भी भयावह होगी क्योंकि आने वाले समय में भारत विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश होगा, जी हाँ! चीन से भी आगे ।

किसी भी स्थिति में आने वाले समय मे भारत आबादी के एक ऐसे स्तर पर पहुंच जाएगा जहां उसके लिए इतने अल्पकाल में भारी संख्या में लोगों की जरूरतों और आकांक्षाओं की पूर्ति करना कठिन हो जाएगा। यह और दूसरे मुद्दे ग्लोबल स्तर पर आपस में जुड़े होते हैं और नीति आयोग सरीखी संस्था को इनका चयन विशेषज्ञता के साथ करना पड़ता है। पिछले 10 सालों में देश की आबादी करीब 10 करोड़ बढ़ी है अर्थात उत्तर प्रदेश के बराबर एक राज्य अथवा पाकिस्तान के बराबर एक देश या फिर आस्ट्रेलिया के बराबर दो देश हमारी आबादी में जुड़े गए हैं। 2011 की जनसंख्या के अनुसार भारत में 1 अरब 21 करोड़ लोग रहते हैं। यह जनसंख्या अमेरिका, इंडोनेशिया, ब्राजील, पाकिस्तान, बांग्लादेश और जापान की कुल जनसंख्या के बराबर है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1991 से 2025 तक के मात्र 34 सालों में भारत की जनसंख्या वृद्धि दर दोगुनी हो जाएगी। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक और रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व की जनसंख्या भी यदि इसी तेजी से बढ़ी तो 2050 तक यह 7 अरब से बढ़ कर 9.2 अरब हो जाएगी। किसी भी देश के विकास पर जनसंख्या का भारी प्रभाव पड़ता है , जनसंख्या किसी भी देश का क्षेत्रफल, देश में उपलब्ध प्राकृतिक साधन( जैसे कि खेती की उपज, दूध और फलों की आपूर्ति, जल की आपूर्ति, बिजली की उपलब्धता इत्यादि) के अनुरूप होने पर ही देश का विकास निश्चित तौर पर होता है। देश में रहने वाले नागरिकों को मकान बना कर रहने के लिए उचित मात्रा में जमीन का उपलब्ध होना आवश्यक है।

जनसंख्या की जरूरत के अनुसार खाद्यान्न की पूर्ति के लिए खेती लायक उपजाऊ जमीन भी आवश्यक है जिससे मौसम के अनुरूप अनाज और फल उगाए जा सकें। पानी और बिजली की आपूर्ति भी देश के नागरिकों को उचित रूप से मिले, यह अति आवश्यक है। भारत में आबादी की निर्भरता का अनुपात 1950 में 7.8 से 2010 में 11.1 तक बढ़ गया है। निर्भरता का अनुपात एक विशेष समय बिंदु पर एक देश, क्षेत्र या भौगोलिक टुकड़े में प्रति सौ आर्थिक रूप से उत्पादक लोगों पर निर्भर लोगों की औसत संख्या है।

आने वाले अगले कुछ ही सालो में भारत जैसे विकासशील देश के लिए जनसंख्या एक सबसे बड़ी चुनौती होगी। जनसांख्यिकीय विकास और आर्थिक विकास में जटिल संबंध होते हैं, खास कर तब जब दोनों अप्रत्याशित स्तर पर पहुंच रहे हों। अगर जनसंख्या ज्यादा है और देश का क्षेत्रफल कम है तो देश के नागरिकों के लिए रिहाइशी जगहों की कमी का सामना करना पड़ सकता है। खेती लायक जमीन अगर देश में ज्यादा नहीं है या जल संसाधनों की आपूर्ति किसी कारण वश कम है तो देशवासियों को खाद्यान्नों की कमी का सामना करना पड़ सकता है।

अब आप सोच रहे होंगे कि मैं ये क्यों बता रहा हूँ , तो इसका कारण है कि ये मुद्दा सीधा आपसे जुड़ा है , हालांकि मैं राजनैतिक पोस्ट नही करता न तो किसी पार्टी की तरफदारी लेकिन कुछ बाते बेहद जरूरी हो जाती है , तो आइए राजनीति से ऊपर उठकर सोचिए और देखिए कि मोदी वाकई क्यों जरूरी है देश के लिए , मोदी की दूरदर्शिता ने आज मुझे आज इस संदर्भ में लिखने पर विवश कर दिया ।।

#भारत_चीन_और_गेटवे_ऑफ_अफ्रीका -

भारत और चीन दो उभरती हुई महाशक्तियां है जिनका दबदबा पूरा विश्व मान रहा है , दोनो एक विकासशील देश है और दोनो की भविष्य की समस्या है बढ़ती हुई जनसंख्या और भारत और चीन दोनों इस बात को जानते हैं कि अफ्रीका महाद्वीप दोनो की बढ़ती जनसंख्या के लिए न सिर्फ रशद और खाद्यान्न की पूर्ति कर सकता है बल्कि रोजगार के नए विकल्प भी दे सकता है । ऐसे में अफ्रीकी देशों के प्रति आकर्षण स्‍वभाविक है।

#अफ्रीका_में_चीन -
अफ्रीका में चीन की 8000 कंपनियां है और चीनी उद्यमों में काम करने के लिए दस लाख चीनी अफ्रीका में बसे हुए हैं। वह बड़े पैमाने पर अफ्रीका में निवेश कर रहा है। उसने बंदरगाह, हवाई अड्डे, रेल और सड़क बनाने में काफी निवेश किया है। चीन, खाड़ी के देश और जापान अफ्रीकी देशों में बड़े पैमाने पर कृषि भूमि खरीद रहे हैं।  हाल ही में रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि चीन युगांडा को अब तक 3 बिलियन डॉलर का कर्ज दे चुका है, साथ ही बीआरआई स्कीम के लिए 2.3 बिलियन डॉलर को लेकर बातचीत चल रही है। चीन अफ्रीका के जिबाउटी में नेवी बेस भी चलाता है, जिससे इस क्षेत्र में भी चीन की रूचि दर्शाता है।हाल के वर्षों में अफ्रीका में चीनी निवेश के प्रवाह में भी तेजी से वृद्धि हुई है। व्यापार एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (अंकटाड) द्वारा प्रकाशित विश्व निवेश रिपोर्ट 2016 के मुताबिक, वर्ष 2014 में चीन अफ्रीका में चौथा सबसे बड़ा निवेशक था। चीन के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का आंकड़ा वर्ष 2009 के 9 अरब अमेरिकी डॉलर से 3 गुना से भी ज्‍यादा बढ़कर वर्ष 2014 में 32 अरब डॉलर के स्‍तर पर पहुंच गया और इसके साथ ही चीन ने दक्षिण अफ्रीका को इस क्षेत्र में विकासशील देशों की ओर से सबसे बड़े निवेशक के रूप में पीछे छोड़ दिया। वैसे तो अफ्रीका में ज्‍यादातर चीनी निवेश वास्तव में सरकार के स्वामित्व वाले बड़े उद्यमों की अगुवाई में ही होते हैं, जो आम तौर पर बुनियादी ढांचागत एवं संसाधन क्षेत्रों में निवेश करते हैं, लेकिन काफी तेजी से बड़ी संख्या में निजी चीनी उद्यमों ने भी कई अफ्रीकी देशों में अपनी-अपनी यूनिटों की स्थापना की है।  अफ्रीका के साथ चीन की आर्थिक साझेदारी महज संसाधनों तक सीमित नहीं है। वैसे तो चीन एवं अफ्रीका के बीच होने वाले कुल व्यापार में विभिन्‍न संसाधनों जैसे कच्चे तेल तथा तांबे के व्यापार का ही मुख्‍य योगदान होता है और चीन ने संसाधन-समृद्ध देशों जैसे अंगोला और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य को ‘संसाधन के बदले अरबों डॉलर के बुनियादी ढांचागत ऋण’ दिए हैं, और अफ्रीका ने  पेइचिंग के बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव को गले लगा लिया है।

#अब_बात_करते_है_भारत_की -
पिछले कुछ वर्षों में जिस परिमाण में उप-सहारा अफ्रीका के साथ भारत के व्यापार में भारी वृद्धि हुई है वह अपने-आप में ही इस बात का प्रमाण है कि उप-सहारा अफ्रीका भारत की नई धुरी है, भारत और उप-सहारा अफ्रीका के बीच सन् 2012 में व्यापार $60 बिलियन डॉलर का हो गया. उसी वर्ष अन्य देशों (योरोपीय संघ ($567.2 बिलियन डॉलर), अमरीका ($446.7 बिलियन डॉलर) और चीन ($220 बिलियन डॉलर) के साथ व्यापार में उल्लेखनीय कमी हुई, तथापि, भारत की व्यापारिक गतिविधियों से यह संकेत मिलता है कि भारत का नया केंद्रबिंदु वह क्षेत्र है, जहाँ उसने आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्रों में विशेषकर संपूर्ण अफ्रीकी महाद्वीप में विशेष कार्यक्रम चलाये हैं।

आर्थिक दृष्टि से भारत की गतिविधियों के तीन स्तंभ हैं -

1- #निवेश_कार्यक्रम -
अफ्रीकी कार्यक्रम को धुरी बनाकर द्विपक्षीय व्यापार और निवेश के क्षेत्रों को चिह्नित किया जाता है और इससे द्विपक्षीय व्यापार को प्रोत्साहन भी मिलता है और पाँच वर्ष की प्रत्येक अवधि के लिए $550 बिलियन डॉलर का निवेश का लक्ष्य रखा गया है। इसके माध्यम से चौबीस अफ्रीकी देशों के साथ व्यापार करने वाली भारतीय कंपनियों को निर्यात में सबसिडी मिलती है और अफ्रीकी सरकारों और क्षेत्रीय संगठनों को लाइन ऑफ़ क्रैडिट मिलता है। साथ ही, अफ्रीका- भारत आंदोलन की पहल (टीम-9 पहल) के तकनीकी आर्थिक दृष्टिकोण के केंद्रबिंदु वे नौ पश्चिमी अफ्रीकी देश हैं, जिन्हें $550 बिलियन डॉलर की एलओसी मिली हुई है। इसके अलावा, भारत के निर्यात को अफ्रीका के चौंतीस कम से कम विकसित देशों (एलडीसी) से उनके बाज़ारों में तरजीही पहुँच मिलती है और भारत ने अफ्रीका को अपनी एलओसी $5.4 बिलियन डॉलर तक बढ़ाने का वचन दिया है। इन सरकारी पहलों के अलावा निजी क्षेत्र की कंपनियाँ भी वहाँ पर भारी मात्रा में लाखों बिलियन डॉलर के वित्तीय निवेश कर रही हैं ।

2 - #विकास_में_मदद -
खास तौर पर भारतीय तकनीकी व आर्थिक सहकारिता (आईटीईसी) कार्यक्रम के रूप में। आईटीईसी का काम है, कृषि के क्षेत्र में क्षमता निर्माण, सिविल या सैन्य प्रशिक्षण या परामर्श सेवाएँ। कुल मिलाकर भारत ने अब तक उप-सहारा अफ्रीका को $1 बिलियन डॉलर की ऐसी सहायता प्रदान की है। इस प्रकार यह क्षेत्र आईटीईसी की सहायता प्राप्त करने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र हो गया है।

3 -  #हाइड्रोकार्बन_या_प्राकृतिक_संसाधन
कभी-कभी भारत की सरकारी और निजी कंपनियों ने तेल या गैस के फ़ील्ड के लिए और उनकी खोज के ठेकों के लिए चीनी सरकार द्वारा समर्थित कंपनियों के साथ कड़ी प्रतियोगिता का प्रयास भी किया है। सन् 2012 में भारत के कच्चे तेल का लगभग 20 प्रतिशत आयात अंगोला, नाइजीरिया, सूडान या दक्षिण अफ्रीका से होने लगा था।

#राजनैतिक_खाइयों_को_पाटने_की_पहल -
जब दो बड़े एशियाई देश अपनी रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता के तहत किसी दूसरे देश पहुंचे तो क्या करना चाहिए? निश्चित तौर पर दोनों ही देशों को गले लगाने का विकल्प सबसे बेहतर साबित होगा और अफ्रीकी यही कर रहे है
भारत-चीन दोनों ही अफ्रीकी देश रवांडा में रुचि ले रहे हैं। खास बात यह है कि जहां भारत-चीन में गेटवे ऑफ अफ्रीका को लेकर कड़ा मुकाबला  चल रहा है वहीं रवांडा भी इन दोनों देशों के साथ रिश्तों में संतुलन बनाने की कोशिश में लगा है। भारत 1983 में अफ्रीकी विकास बैंक का सदस्य बना था, लेकिन इस साझेदारी को अगले स्तर पर ले जाने में उसे 30 साल लग गए, इस सुस्ती से यह भी पता चलता है कि भारत अफ्रीका में किस हद तक दिलचस्पी ले रहा था, हालांकि वह इस समय वहां पांचवां सबसे बड़ा निवेशक है, अफ्रीका के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भारत की हिस्सेदारी 54 अरब डॉलर या तकरीबन 19.2 फीसदी है, इसके साथ ही 2015-16 में द्विपक्षीय व्यापार 56.9 अरब डॉलर था, अफ्रीका में अपना निवेश और उपस्थिति बढ़ाने के लिए भारत को इससे जुड़े फैसले लेने की गति बढ़ानी होगी।अफ्रीकी देश चाहते हैं कि वहां निवेश सिर्फ प्राकृतिक संसाधन हासिल करने के लिए न हो और उसमें विविधता आए, यानी अब इस दिशा में भारत को कोशिश करने की जरूरत है, यही एकमात्र कोशिश उसे अफ्रीका में चीन और यूरोपीय संघ (ईयू) से अलग और आगे खड़ा कर देगी। और मोदी वही कर रहे है  रवांडा में दो दिन तक रहे पीएम मोदी ने इस देश को 20 करोड़ डॉलर का कर्ज देने का वादा किया है। इसमें से आधे धन का इस्तेमाल रवांडा सिंचाई व्यवस्था विकसित करने और बाकी आधे का स्पेशल इकनॉमिक जोन (SEZ) बनाने में करेगा। भारत ने पिछले साल भी रवांडा को 12 करोड़ डॉलर का कर्ज दिया था। हालांकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि नया कर्ज इससे अलग है या इसी का हिस्सा। दूसरी तरफ, चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग भी रविवार को रवांडा में थे। इस दौरान उन्होंने रवांडा को 12.6 करोड़ डॉलर देने का वादा किया। इसमें से 7 करोड़ 60 लाख डॉलर हुए से किबेहो तक सड़क बनाने के लिए और बाकी नए बुगेसेरा एयरपोर्ट तक पहुंचने के लिए सड़क बनाने पर खर्च होगा।

#गाय_देकर_दिल_जीतने_की_कोशिश -

भारत की तरह ही रवांडा में भी गाय को समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, रवांडा के प्राचीन इतिहास में गाय को मुद्रा की तरह प्रयोग में लाया जाता था, आपको बता दूँ कि भारत की तरह रवांडा भी कृषि प्रधान देश है,पीएम मोदी ने अपनी इस यात्रा में रवांडा को 200 गायें दी हैं, भारत सरकार के इस फैसले की चर्चा हो रही है, दरअसल इस फैसले के पीछे रवांडा सरकार की ओर से चलाई जा रही है एक योजना है जिसका नाम 'गिरिंका' है, इस योजना के तहत सरकार वहां पर कुपोषण दूर करने के लिये 3.50 लाख गांवों को गाय देगी और फिर उसके पैदा हुई एक बछिया को वह अपने पड़ोसी को देगा, इस योजना का मकसद इन गायों के दूध से परिवार अपने बच्चों का कुपोषण दूर करेंगे साथ ही दुग्ध उद्योग को भी बढ़ावा दिया जायेगा , यहां की 80 फीसदी खेती से जुड़ी है, रवांडा की आबादी 1.12 करोड़ है यहां की संसद में 2 तिहाई महिला सांसद है । इस शब्द का अर्थ होता है 'एक गाय रखिए'। रवांडा की सरकार ने साल 2006 में 'एक गरीब परिवार के लिए एक गाय' योजना लॉन्च की थी। इस योजना के जरिए कई परिवार गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकले हैं। रवांडा सरकार का दावा है कि इस योजना से अबतक 3.5 लाख परिवारों को फायदा मिला है।

#विशेष -
भारत और अफ्रीका के आपसी घनिष्‍ठ आर्थिक संबंधों से संभावित लाभ अभी तक पूरी तरह हासिल नहीं किए जा सके हैं। अपने विनिर्माण क्षेत्र में नई जान फूंकने और युवाओं के लिए रोजगार सृजित करने के उद्देश्‍य से भारत को अपने विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार करने के लिए अब और भी अधिक सक्रिय रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। भारत का बीमार विनिर्माण क्षेत्र वास्तव में अफ्रीका के तेजी से बढ़ते मध्यम वर्ग की अनदेखी करने का जोखिम नहीं उठा सकता है। दूसरी बात यह है कि चीन के पास मौजूद ‘ढेर सारे पैसे’ से भारत के बराबरी न कर पाने की असमर्थता को देखते हुए भारत के विकास सहयोग का अब कहीं ज्‍यादा रणनीतिक होना अवश्‍य ही जरूरी है। औरर  मोदी सरकार वही कर रही है भविष्य की असली लड़ाई की तैयारी क्योंकि यदि यदि भारत को गृहयुद्ध से बचना है तो या तो जनसंख्या नियंत्रण करे या उस जनसंख्या के लिए जमीन पानी खाद्दयन की व्यवस्था , और मुझे गर्व है कि मोदी भविष्य के लिए काम कर रहे है परिणाम देर से भले अभी न दिख रहा हो लेकिन निश्चित परिमाण मिलेगा ,, मोदी आपके भविष्य को सुरक्षित कर रहे है और आने वाली कोई भी सरकार हो उसे भी यही देखना पड़ेगा ।।

कॉपी : अजेष्ठ त्रिपाठी जी

गज़वा ए हिन्द..!

ते न्यूज़ (कटिंग) सोशल मीडिया पर छाया हुआ है . कहा जा रहा है 2028 तक गज़वा ए हिन्द के लिए करीब एक करोड़ जेहादियों को तैयार किया जा रहा है . अगर यह सच है तो मामला बहुत गंभीर है ....सच नही होने जैसा कुछ नही है . गज़वा ए हिंद तो मुल्ले मौलवियों का टॉप प्लान में रहता ही है ......खैर

हमे क्या करना है ?

ये सोशल मीडिया का दौर है , यहां अगला कितना भी सीक्रेट मिशन चलाये उसे एक्सपोज़ होना ही है और हमे काउंटर मेकेनिज़्म पर काम करना है . अगला युद्ध जाहिलों का नही है , जाहिल बनाम टेक्नोलॉजी की लड़ाई होगी . अतः हमें टेक्निकली स्ट्रांग रहना है और रष्ट्रीयता भी भावना में डूबे रहना है . राष्ट्र है तो हम है , दुश्मनों का एक ही मकसद है , इस राष्ट्र को और खंडित करना , हमारे अस्तिव को मिटाना . यह सब कुछ आज भी चल रहा है , यह हम सब जानते हैं . अंदर खाने में जेहादी मोहब्बत का पाठ नही पढ़ा रहे हैं , ये तो इस देश हासिल करने और हमे गुलाम बनाने के का ख्वाब लिए चल रहे हैं ....अतः सजग रहे और लोगों को जगाते रहे .

इसका एक दूसरा पहलू भी है .

युद्ध काल मे हमारी सेना देश के दुश्मनों का नाश कर देगी , जब हमारे अस्तिव की लड़ाई होगी तो हमारी देशभक्त सेना हमारे साथ हर मोर्चे पर खड़ी रहेगी . एक हमारी सेना ही है जिसके बारे में स्मरण कर हम सुख चैन से सोते हैं .....वरना आज किस फील्ड में हमारे नेता इनके बारगेनिंग के सामने नही झुक रहे हैं . अभी हाल में एक वीडियो देख रहा था . उस वीडियो को हम सभी देखना चाहिए .

दृश्य

इस्लामिक सेंटर बनाना है , मदरसों को मजबूत करना है और करोड़ो का फंडिंग चाहिए , मदरसों में थोक के भाव मे मौलवियों की भर्ती करानी है . आप यकीन नही करेंगे सारी मांगों को मुख्यमंत्री खड़े खड़े मान लेते हैं .....और ठीक उनके सामने बैठा ओवैसी (जूनियर) से नज़र से नज़र मिलाकर कह रहे हैं ....,