प्रशासन में व्याप्त धिम्मी लक्षण :-
"हम अपनी ही मौत का सामान ले चले,,,, खुशी खुशी,,,," यह पंक्ति मुझे तब याद आयी जब एक इलेक्शन पार्टी का नम्बर उस बूथ पर आया जहाँ अतिसंवेदनशील वातावरण रहता है और उस बूथ पर हरेक सरकारी नुमाइंदा पिटकर आता है,,,, कारण वहाँ 100% जनसंख्या देश के सबसे लाडले समुदाय की है। वे थैले, बिस्तर, मतपेटियां, कांधे पर लादे,,, जब वाहन में बैठ रहे थे, सबकी निगाहें उन पर ऐसी टिकी थी मानो कुछ निरीह पशुओं को बूचड़खाने की ब्लेड की तरफ धकेला जा रहा है,,,,!!
जब भी कोई नियम कायदा लादना हो, शांतिप्रिय समुदाय को तुरंत, छूट दी जाती है। मतलब,,, आलम यह है कि उनकी बात आते ही, अपने आप, स्वतः स्फूर्त तरीके सब कुछ बिछता चला जाता है।
क्या ही तो ये, भाग्य #लिखवाकर लाये हैं?
कई बार आश्चर्य होता है,,,?
कहीं यह #चमत्कार तो नहीं, उनके देवताओं का,,,, कि एक साथ हिंदुओं की बुद्धि मरोड़ दी जाती है और एक के बाद #अनुकूलताएं आती ही बनती ही चली जाती हैं।
यह सब धिम्मी प्रभाव के कारण है।
वर्षों तक किये गए तुष्टीकरण और पीढ़ियों तक हुए अत्याचारों के कारण, आज हिंदुओं के डीएनए में ही यह बात स्थापित हो गई है,,, कि बात जब उनकी आए तो चुपचाप करते चलो, कौन लफड़े में फंसे,, जब सब कुछ उनके फेवर में है तो मैं अपना भविष्य क्यों दांव पर लगाऊँ,,,, कि हिन्दू तो है ही मरने कटने के लिए,,,, कि जब डीजी वणजारा तक सुरक्षित नहीं तो मेरी क्या औकात है?,,,, और बुरी बात यह है कि धिम्मिग्रस्त मनुष्य को हम समझा भी नहीं सकते।
यह एक बीमार मानसिकता में जीने की दशा है। उनके जाल में राजी खुशी फँसने जैसा,,,,,
उसे जब समझाया जाएगा तो वह मानवता और सद्भाव के ऐसे खूबसूरत तर्क लेकर बैठ जाएगा, बड़े बड़े राष्ट्रवादी भी उनकी संगति से बीमार पड़ जाएं और उनके जैसा ही आचरण करने लगें।
ऐसे में दस-बीस रुपयों की लालच के सहारे, अपने परिवार का "उज्ज्वल भविष्य" देखने वाले, भ्रष्ट, रिश्वतखोर, कामचोर, सरकारी नुमाइंदों से यह अपेक्षा करना कि वे संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार की मूल भावना के अनुरूप काम करते रहेंगे,,,, एक मिथ्या कल्पना ही है।
@Unkonwn
"हम अपनी ही मौत का सामान ले चले,,,, खुशी खुशी,,,," यह पंक्ति मुझे तब याद आयी जब एक इलेक्शन पार्टी का नम्बर उस बूथ पर आया जहाँ अतिसंवेदनशील वातावरण रहता है और उस बूथ पर हरेक सरकारी नुमाइंदा पिटकर आता है,,,, कारण वहाँ 100% जनसंख्या देश के सबसे लाडले समुदाय की है। वे थैले, बिस्तर, मतपेटियां, कांधे पर लादे,,, जब वाहन में बैठ रहे थे, सबकी निगाहें उन पर ऐसी टिकी थी मानो कुछ निरीह पशुओं को बूचड़खाने की ब्लेड की तरफ धकेला जा रहा है,,,,!!
जब भी कोई नियम कायदा लादना हो, शांतिप्रिय समुदाय को तुरंत, छूट दी जाती है। मतलब,,, आलम यह है कि उनकी बात आते ही, अपने आप, स्वतः स्फूर्त तरीके सब कुछ बिछता चला जाता है।
क्या ही तो ये, भाग्य #लिखवाकर लाये हैं?
कई बार आश्चर्य होता है,,,?
कहीं यह #चमत्कार तो नहीं, उनके देवताओं का,,,, कि एक साथ हिंदुओं की बुद्धि मरोड़ दी जाती है और एक के बाद #अनुकूलताएं आती ही बनती ही चली जाती हैं।
यह सब धिम्मी प्रभाव के कारण है।
वर्षों तक किये गए तुष्टीकरण और पीढ़ियों तक हुए अत्याचारों के कारण, आज हिंदुओं के डीएनए में ही यह बात स्थापित हो गई है,,, कि बात जब उनकी आए तो चुपचाप करते चलो, कौन लफड़े में फंसे,, जब सब कुछ उनके फेवर में है तो मैं अपना भविष्य क्यों दांव पर लगाऊँ,,,, कि हिन्दू तो है ही मरने कटने के लिए,,,, कि जब डीजी वणजारा तक सुरक्षित नहीं तो मेरी क्या औकात है?,,,, और बुरी बात यह है कि धिम्मिग्रस्त मनुष्य को हम समझा भी नहीं सकते।
यह एक बीमार मानसिकता में जीने की दशा है। उनके जाल में राजी खुशी फँसने जैसा,,,,,
उसे जब समझाया जाएगा तो वह मानवता और सद्भाव के ऐसे खूबसूरत तर्क लेकर बैठ जाएगा, बड़े बड़े राष्ट्रवादी भी उनकी संगति से बीमार पड़ जाएं और उनके जैसा ही आचरण करने लगें।
ऐसे में दस-बीस रुपयों की लालच के सहारे, अपने परिवार का "उज्ज्वल भविष्य" देखने वाले, भ्रष्ट, रिश्वतखोर, कामचोर, सरकारी नुमाइंदों से यह अपेक्षा करना कि वे संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार की मूल भावना के अनुरूप काम करते रहेंगे,,,, एक मिथ्या कल्पना ही है।
@Unkonwn

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