Saturday, August 11, 2018

नफ़रत..!

#रूस_के_जासूस_का_भारत_को_तोड़ने_वाले_भारतियों_का_पर्दाफाश

दूध तो आप सभी मित्रों ने ज़िन्दगी में कभी उबाला होगा और यह भी अनुभव किया होगा कि आप खड़े खड़े दूध के उबलने का इंतज़ार कर रहे हैं और फिर आपका ध्यान जरा सा चूका कि दूध अचानक से उबल कर बर्तन से बाहर। फिर करते रहिये साफ़ सफाई और सुनते रहिये दुनियाभर की बातें।
आज जो कांवरियों पर, गौरक्षकों पर, दलितों के मुद्दों पर , अल्संख्यकों के मुद्दों पर, जेएनयू में अचानक से उबाल नज़र आ रहा है वो एक दिन, एक महीने, एक साल या एक दशक की कहानी नहीं है। उसकी पतीली गैस पर आज़ादी मिलने के दिन से ही चढ़ा दी गयी थी।

यूरी बेज़मैनोव रूस का एक जासूस था जिसे इन्दिरा गाँधी की सरकार के दौरान केजीबी के एजेंट के रूप में भारत भेजा गए था। इंदिरा गाँधी तक को इस बात की भनक नहीं थी कि दुभाषिये के रूप में य जासूस है। एक अमेरिकन टीवी को अपने इंटरवयू में बेज़मैनोव बताता है कि उसकी टीम को भारत में "#यूज़फुल_इंडियन_इडियट्स का ब्रैनवॉश करके वामपंथी आइडियोलॉजी वाला गैंग तैयार करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी थी।
उन्हें रसूखदार व्यक्तियों, भारतीय मीडिया से जुड़े व्यक्तियों, फिल्मकारों , शिक्षा जगत से जुड़े बुद्धिजीवियों, अहंकारी और सनकी व्यक्तियों जिनके कोई आदर्श और नीतियाँ न हों ऐसे लोगों को भर्ती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था।
उदाहरण के लिए , सुमित्रा नन्दन पंत जिन्होंने " Rhapsody To Lenin" लिखी थी , इस कारण उन्हें रशिया आमंत्रित किया गया , जिसका पूरा खर्च रूस की सरकार ने वहन किया था। #लिंक में सुमित्रा नंदन पंत जिस सभा में खड़े हो कर कुछ कह रहे हैं हैं उनकी मेज पर शराब की बोतलें नज़र आ रहीं है। इन शराब की बोतलों की तरफ इशारा करते हुए बेज़मैनोव कहता है कि मेहमानों की जागरूकता और जिज्ञासा को मारने का यह एक तरीका था। केजीबी के कार्यों में एक मुख्य कार्य मेहमानों को हमेशा नशे में धुत्त रखना होता था। जैसे ही कोई मेहमान मास्को एयरपोर्ट पर उतरता था उसे मेहमानों के लिए बनाये गए विशिष्ट कक्ष में ले जाया जाता था और दोस्ती के नाम पर एक जाम होता था। एक गिलास वोदका फिर दूसरा गिलास वोदका और कुछ ही समय में मेहमान को दुनिया गुलाबी नज़र आने लगती थी। और 10-15 दिन जब तक मेहमान रशिया में रहता था तब तक उन्हें इसी हालत में रखा जाता था।
आगे यूरी बेज़मैनोव बताता है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेस्सरों ,वामपंथी और वामपंथ की तरफ झुकाव रखने वाली पार्टियों , लेखकों, कवियों, भारतीय मीडिया , समाचार पत्रों, नक्सलवादियों और माओवादियों को आज़ादी के बाद से ही रूस वामपंथी आइडियोलॉजी को भारत में फ़ैलाने के लिए फंडिंग करता चला आ रहा है।
अपने अभियान के पहले चरण में उन्होंने जेएनयू और डीयू के प्रोफेसरों से दोस्ती की। दुसरे चरण में ये इन प्रोफेसरों को इंडो सोवियत फ्रेंडशिप सोसाइटी की बैठक में बुलाते थे। इन मीटिंग्स का पूरा खर्च सोवियत सरकार वहन करती थी। इन प्रोफेसरों को यकीं दिलाया जाता था कि वे बहुत गंभीर और विलक्षण किस्म के बुद्धिजीवी हैं। जबकि भावना इसके बिलकुल विपरीत होती थी। उन्हें बुलाया इसलिए जाता था क्योंकिवे " यूज़फुल इडियट्स" होते थे और वे सोवियत संघ द्वारा पढ़ाई गयी पट्टी को बहुत एकाग्र चित से कंठस्थ करके भारत आते थे और फिर अपने द्वारा पढ़ाये जाने वाले हर विद्यार्थी को वामपंथ की वही पट्टी दशकों तक पढ़ाते थे। (जरा सोचिये --जेएनयू की निवेदिता मेनन क्या इसी श्रेणी में तो नहीं आतीं ???)
बेज़मैनोव के अनुसार भारत के वामपंथ, लेफ्टविंग मीडिया छदमबुद्धिजीवियों, लेखकों और पत्रकारों को इस समय पाकिस्तान की आई इस आई पोषित और संचालित कर रही है। जो लोग सोवियत और आईएसआई की विचारधारा को आगे बढ़ाते हैं उन्हें मीडिया के शोर और फ़र्ज़ी जनमत के आधार पर महत्वपूर्ण पदों पर बिठा दिया जाता है। और जो इनकी विचारधारा का समर्थन नहीं करते उनकी या तो हत्या कर दी जाती है या चरित्र हनन करके उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा जाता।
किसी दिन बेज़मैनोव की आत्मा को भारत के के खिलाफ इन षड्यंत्रों ने जगा दिया और वे इनसे दरकिनार होने के लिए भूमिगत हो गए। भारत सरकार ने उनकी गुमशुदगी के विज्ञापन छपवाए जिससे जब वे मिल जाएँ तो उन्हें रूस सरकार के सुपुर्द कर दिया जाए। लेकिन बेज़मैनोव को मालूम था की यदि वे पकडे गए तो रूस की सरकार उन्हें मरवा देगी इसलिए वे चुप कर कनाडा चले गए जहाँ उन्होंने कुछ टीवी इंटरव्यू दिए जिनमे से एक का अंश यह है।
बेज़मैनोव का मानना था कि यदि भारत में स्थिति सुधारनी है तो आज इसी वक़्त से शिक्षा प्रणाली और व्यवस्था बदलनी होगी तब कहीं अगले 20-25 सालों में बदलाव आना शुरू होगा।
परन्तु जैसा कि उन्हें अंदेशा था रूस की सरकार ने उन्हें ज्यादा मुंह खोलने का  दिया और हत्या करवा दी।

https://rightlog.in/2017/04/russian-spy-yuri-bezmenov-conspiracy-01/

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अब आपको समझ आया कि रात में हुई घटना में सुबह पीड़ित की जाति कैसे छप जाती है ?? अब आपको पता चला कि जुनैद , पहलु खान , अख़लाक़ , गौरी लंकेश तो महीनो भर सुर्ख़ियों में छाते हैं लेकिन प्रशांत पुजारी को कोई नहीं पूछता। अब आपको पता चला कि कठुआ पर फ़िल्मी अदाकाराओं के पेट में दर्द क्यों होता है मंदसौर और बाड़मेर पर क्यों नहीं होता ??? अब आपको पता चला कि रोहिंगिया मुसलमानों पर सुप्रीम कोर्ट को दर्द क्यों होता है लेकिन पकिस्तान से आये हुए प्रताड़ित हिन्दू शरणार्थियों को जबरदस्ती वापिस भेजने पर किसी की आह नहीं निकलती ??? अब आपको मालूम पड़ा कि सेना पर पत्थर फेंकने वालों के खिलाफ पेलेट गईं चलने की मनाही क्यों होती है और उन पर से केस क्यों वापिस हो जाते है और कांवरियों पर अटोर्नी जनरल और सुप्रीम कोर्ट क्यों एक साथ चिल्ला पड़ते है ??? अब आपको पता चला कि बँगाल में और केरल में हिन्दुओं की हत्यायों पर चर्चा क्यों नहीं होती और अलवर का आदतन गौतस्कर रक्बर खान क्यों पूरा सिस्टम हिला देता है ???? अब आपको पता चला कि ईसाई चर्चों और मदरसों में बलात्कारों की ख़बरें कैसे छुप जातीं हैं और सिर्फ हिन्दुओं की ख़बरें कैसे हफ़्तों तक चलायी जातीं हैं ???
इसके लिए मीडिया और देशद्रोही ताकतें जितनी जिम्मेदार हैं उतने ही है हमारे बीच में फैले हुए useful idiots भी जिम्मेदार हैं जो अपनी वृहदमानस्किता दिखाने के फेर में इन षड्यंत्रकारियों के साथ खड़े हो कर उनका मनोबल बढ़ाते हैं या कुछ ऐसे भी हैं जैसे आज एक मित्र की कांवरियों पर ( दो भाई अपने माँ बाप को काँवर में ले जा रहे हैं)वाली पोस्ट एक तूचिये यदुवंशी की टिपण्णी देखी कि " जिनके पास कोई काम नहीं होता वो काँवर ले कर जाते है। "
https://shivashaurya.blogspot.com/2018/08/blog-post.html
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Thursday, August 9, 2018

समुदाय विशेष! कैसी धर्मनिरपेक्षता?

प्रशासन में व्याप्त धिम्मी लक्षण :-
"हम अपनी ही मौत का सामान ले चले,,,, खुशी खुशी,,,," यह पंक्ति मुझे तब याद आयी जब एक इलेक्शन पार्टी का नम्बर उस बूथ पर आया जहाँ अतिसंवेदनशील वातावरण रहता है और उस बूथ पर हरेक सरकारी नुमाइंदा पिटकर आता है,,,, कारण वहाँ 100% जनसंख्या देश के सबसे लाडले समुदाय की है। वे थैले, बिस्तर, मतपेटियां, कांधे पर लादे,,, जब वाहन में बैठ रहे थे, सबकी निगाहें उन पर ऐसी टिकी थी मानो कुछ निरीह पशुओं को बूचड़खाने की ब्लेड की तरफ धकेला जा रहा है,,,,!!
जब भी कोई नियम कायदा लादना हो, शांतिप्रिय समुदाय को तुरंत, छूट दी जाती है। मतलब,,, आलम यह है कि उनकी बात आते ही, अपने आप, स्वतः स्फूर्त तरीके सब कुछ बिछता चला जाता है।
क्या ही तो ये, भाग्य #लिखवाकर लाये हैं?
कई बार आश्चर्य होता है,,,?
कहीं यह #चमत्कार तो नहीं, उनके देवताओं का,,,, कि एक साथ हिंदुओं की बुद्धि मरोड़ दी जाती है और एक के बाद #अनुकूलताएं आती ही बनती ही चली जाती हैं।
यह सब धिम्मी प्रभाव के कारण है।
वर्षों तक किये गए तुष्टीकरण और पीढ़ियों तक हुए अत्याचारों के कारण, आज हिंदुओं के डीएनए में ही यह बात स्थापित हो गई है,,, कि बात जब उनकी आए तो चुपचाप करते चलो, कौन लफड़े में फंसे,, जब सब कुछ उनके फेवर में है तो मैं अपना भविष्य क्यों दांव पर लगाऊँ,,,, कि हिन्दू तो है ही मरने कटने के लिए,,,, कि जब डीजी वणजारा तक सुरक्षित नहीं तो मेरी क्या औकात है?,,,, और बुरी बात यह है कि धिम्मिग्रस्त मनुष्य को हम समझा भी नहीं सकते।
यह एक बीमार मानसिकता में जीने की दशा है। उनके जाल में राजी खुशी फँसने जैसा,,,,,
उसे जब समझाया जाएगा तो वह मानवता और सद्भाव के ऐसे खूबसूरत तर्क लेकर बैठ जाएगा, बड़े बड़े राष्ट्रवादी भी उनकी संगति से बीमार पड़ जाएं और उनके जैसा ही आचरण करने लगें।
ऐसे में दस-बीस रुपयों की लालच के सहारे, अपने परिवार का "उज्ज्वल भविष्य" देखने वाले, भ्रष्ट, रिश्वतखोर, कामचोर, सरकारी नुमाइंदों से यह अपेक्षा करना कि वे संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार की मूल भावना के अनुरूप काम करते रहेंगे,,,, एक मिथ्या कल्पना ही है।
@Unkonwn

Friday, August 3, 2018

परीक्षा या संयम की परीक्षा!

एक राज्य से दूसरे राज्य भेजने का क्या मतलब..!
रेलवे ग्रुप C के परीक्षार्थी कटिहार पूर्णिया मधेपुरा सुपौल हरसा इत्यादि जिला के छात्र पंजाब,केरल उड़ीसा परीक्षा देने जाएे, यह षड्यंत्र है हम तो कहते है दुबई भेज देते,बेहतर  होता  !मोदी जी क्या  यही  अच्छे  दिन  हैं छात्रों का ?
समस्या यहीं  ख़त्म नहीं होगा  छात्रों का अब जो भूपेंद्र नारायण  मंडल यूनिवर्सिटी  में प art2 और प art3 में नामांकित  है उनका  परीक्षा  भी 7 अगस्त  से शुरू हो रहा है !  जैसे  की कुछ छात्रों के पार्ट 2 का  परीक्षा  30अगस्त को ख़त्म होना  है और उससे  एक दिन पहले  29 अगस्त को रेलवे  का परीक्षा है क्या यह  संभव  है की  वे   इंदौर  मध्यप्रदेश  से 29 अगस्त को परीक्षा देकर  पुनः  30 अगस्त को k p कॉलेज  मुरलीगंज  मधेपुरा वापस  आकर  परीक्षा दे  पाएंगे  ? आज सवाल  मोदी जी से नहीं करूँगा  मैं मुझे उनसे  कोई  गिला  शिकवा  नहीं मुझे शिकायत  उन  नौजवान  साथियों से है जो भक्ति  में लीन  होकर  इस प्रकार  अगर  कोई केंद्र  सर्कार और मोदी जी के खिलाफ  कुछ लिखता है तो मेरे अपने साथी अभद्र  भाषाओँ  का प्रयोग  करने लगते  हैं !
साथियों केंद्र  सर्कार के इस नियत  और नीति  को समझने  की आवस्यकता  है जो छात्रों को तंग  और परेशान ही कर रही हैं ! वादा  2 करोड़  रोज़गार  देने  का हुआ  थ सां आप खुद  अनुभव  करें क्या ऐसा  हुआ ?
और आप इसी  रेलवे फॉर्म को भरने  में हुई  कठनाई  अन्य  फॉर्म और परीक्षा में भी इसी प्रकार छात्रों को परेशान किया जा रहा है !

  मुझे लगता है, गरीब छात्र को खुन बेचकर परीक्षा देने जाना होगा, 400 रू नहीं देते  रेल मंत्रीजी, तो सही था, अब मौहाली पँहुच कर अाने में 3000-4000 ₹ चाहिऐ, जो कि गरीब छात्र के लिए इतना पैसा कहाँ से आएगा
इससे पहले भी सभी रेलवे बोर्डों का सम्मिलित परीक्षा हुई है जो कि परीक्षार्थी के होम स्टेट में ही सेंटर दिया जाता था सभी ट्रेनों में आरक्षित सीटों में लंबी वेटिंग लिस्ट अभी से ही दिखाई दे रही है !

 यह रेल मंत्री का सोची समझी साजिश है कि दूर सेंटर रहने पर छात्र परीक्षा में सम्मिलित नहीं हो पाएंगे और रेलवे बोर्ड को ₹400 लौटाना नहीं पड़ेगा

 इस वैकेंसी के शुरुआत से ही छात्रों को आंदोलन करना पड़ा है अभ्यर्थी से पहले ₹500 भी दिया गया बाद में पुनः नोटिफिकेशन आया कि ₹400 परीक्षा के बाद लौटा दिया जाएगा फिर छात्रों ने आंदोलन किया ग्रुप D से ITI को हटाने के लिए फिर नोटिफिकेशन आया ITI को हटाया गया!

Wednesday, August 1, 2018

मनुस्मृति : दुष्प्रचार खण्डन।

#मनुस्मृति... पूरा लेख अवश्य पढ़े..

मनुस्मृति, मनुवाद के बारे में फैली तमाम भ्रांतियों को दूर करने के लिये इस लेख को अवश्य पढ़ें..... मनु कहते हैं-

 जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं।
 वर्तमान दौर में ‘मनुवाद’ शब्द को नकारात्मक अर्थों में लिया जा रहा है। ब्राह्मणवाद को भी मनुवाद के ही पर्यायवाची के रूप में उपयोग किया जाता है। वास्तविकता में तो मनुवाद की रट लगाने वाले लोग मनु अथवा मनुस्मृति के बारे में जानते ही नहीं है या फिर अपने निहित स्वार्थों के लिए मनुवाद का राग अलापते रहते हैं। दरअसल, जिस जाति व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को दोषी ठहराया जाता है, उसमें जातिवाद का उल्लेख तक नहीं है ।

क्या है ? मनुवाद :
जब हम बार-बार मनुवाद शब्द सुनते हैं तो हमारे मन में भी सवाल कौंधता है कि आखिर यह मनुवाद है क्या ?
महर्षि मनु मानव संविधान के प्रथम प्रवक्ता और आदि शासक माने जाते हैं। मनु की संतान होने के कारण ही मनुष्यों को मानव या मनुष्य कहा जाता है।
अर्थात मनु की संतान ही मनुष्य है। सृष्टि के सभी प्राणियों में एकमात्र मनुष्य ही है जिसे विचारशक्ति प्राप्त है। मनु ने मनुस्मृ‍ति में समाज संचालन के लिए जो व्यवस्थाएं दी हैं, उसे ही सकारात्मक अर्थों में मनुवाद कहा जा सकता है।

 मनुस्मृति :
समाज के संचालन के लिए जो व्यवस्थाएं दी हैं, उन सबका संग्रह मनुस्मृति में है। अर्थात मनुस्मृति मानव समाज का प्रथम संविधान है, न्याय व्यवस्था का शास्त्र है। यह वेदों के अनुकूल है। वेद की कानून व्यवस्था अथवा न्याय व्यवस्था को कर्तव्य व्यवस्था भी कहा गया है। उसी के आधार पर मनु ने सरल भाषा में मनुस्मृति का निर्माण किया। वैदिक दर्शन में संविधान या कानून का नाम ही धर्मशास्त्र है।

महर्षि मनु कहते है-
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। यदि वर्तमान संदर्भ में कहें तो जो कानून की रक्षा करता है कानून उसकी रक्षा करता है। कानून सबके लिए अनिवार्य तथा समान होता है।

 मनु ने भी कर्तव्य पालन पर सर्वाधिक बल दिया है। उसी कर्तव्यशास्त्र का नाम मानव धर्मशास्त्र या मनुस्मृति है। आजकल अधिकारों की बात ज्यादा की जाती है, कर्तव्यों की बात कोई नहीं करता। इसीलिए समाज में विसंगतियां देखने को मिलती हैं।
मनुस्मृति के आधार पर ही आगे चलकर महर्षि याज्ञवल्क्य ने भी धर्मशास्त्र का निर्माण किया जिसे याज्ञवल्क्य स्मृति के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी काल में भी भारत की कानून व्यवस्था का मूल आधार मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति रहा है। कानून के विद्यार्थी इसे भली-भांति जानते हैं। राजस्थान हाईकोर्ट में मनु की प्रतिमा भी स्थापित है।

मनुस्मृति में दलित विरोध :

मनुस्मृति न तो दलित विरोधी है और न ही ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देती है। यह सिर्फ मानवता की बात करती है और मानवीय कर्तव्यों की बात करती है।
मनु किसी को दलित नहीं मानते।
दलित संबंधी व्यवस्थाएं तो अंग्रेजों और आधुनिकवादियों की देन हैं। दलित शब्द प्राचीन संस्कृति में है ही नहीं। चार वर्ण जाति न होकर मनुष्य की चार श्रेणियां हैं, जो पूरी तरह उसकी योग्यता पर आधारित है।
प्रथम ब्राह्मण, द्वितीय क्षत्रिय, तृतीय वैश्य और चतुर्थ शूद्र।
वर्तमान संदर्भ में भी यदि हम देखें तो शासन-प्रशासन को संचालन के लिए लोगों को चार श्रेणियों- प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में बांटा गया है। मनु की व्यवस्था के अनुसार हम प्रथम श्रेणी को ब्राह्मण, द्वितीय को क्षत्रिय, तृतीय को वैश्य और चतुर्थ को शूद्र की श्रेणी में रख सकते हैं।
जन्म के आधार पर फिर उसकी जाति कोई भी हो सकती है। मनुस्मृति एक ही मनुष्य जाति को मानती है। उस मनुष्य जाति के दो भेद हैं। वे हैं पुरुष और स्त्री। 

 मनु की व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण की संतान यदि अयोग्य है तो वह अपनी योग्यता के अनुसार चतुर्थ श्रेणी या शूद्र बन जाती है।
ऐसे ही चतुर्थ श्रेणी अथवा शूद्र की संतान योग्यता के आधार पर प्रथम श्रेणी अथवा ब्राह्मण बन सकती है।

हमारे प्राचीन समाज में ऐसे कई उदाहरण है, जब व्यक्ति शूद्र से ब्राह्मण बना। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुरु वशिष्ठ महाशूद्र चांडाल की संतान थे, लेकिन अपनी योग्यता के बल पर वे ब्रह्मर्षि बने।
एक मछुआ (निषाद) मां की संतान व्यास महर्षि व्यास बने। आज भी कथा-भागवत शुरू होने से पहले व्यास पीठ पूजन की परंपरा है।
विश्वामित्र अपनी योग्यता से क्षत्रिय से ब्रह्मर्षि बने। ऐसे और भी कई उदाहरण हमारे ग्रंथों में मौजूद हैं, जिनसे इन आरोपों का स्वत: ही खंडन होता है कि मनु दलित विरोधी थे।

ब्राह्मणोsस्य मुखमासीद्‍ बाहु राजन्य कृत:।
उरु तदस्य यद्वैश्य: पद्मयां शूद्रो अजायत। (ऋग्वेद)

अर्थात ब्राह्णों की उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से, भुजाओं से क्षत्रिय, उदर से वैश्य तथा पांवों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई। दरअसल, कुछ अंग्रेजों या अन्य लोगों के गलत भाष्य के कारण शूद्रों को पैरों से उत्पन्न बताने के कारण निकृष्ट मान लिया गया,
जबकि हकीकत में पांव श्रम का प्रतीक हैं। ब्रह्मा के मुख से पैदा होने से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति या समूह से है जिसका कार्य बुद्धि से संबंधित है अर्थात अध्ययन और अध्यापन। आज के बुद्धिजीवी वर्ग को हम इस श्रेणी में रख सकते हैं।
भुजा से उत्पन्न क्षत्रिय वर्ण अर्थात आज का रक्षक वर्ग या सुरक्षाबलों में कार्यरत व्यक्ति।
उदर से पैदा हुआ वैश्य अर्थात उत्पादक या व्यापारी वर्ग। अंत में चरणों से उत्पन्न शूद्र वर्ग।

 यहां यह देखने और समझने की जरूरत है कि पांवों से उत्पन्न होने के कारण इस वर्ग को अपवित्र या निकृष्ट बताने की साजिश की गई है, जबकि मनु के अनुसार यह ऐसा वर्ग है जो न तो बुद्धि का उपयोग कर सकता है, न ही उसके शरीर में पर्याप्त बल है और व्यापार कर्म करने में भी वह सक्षम नहीं है। ऐसे में वह सेवा कार्य अथवा श्रमिक के रूप में कार्य कर समाज में अपने योगदान दे सकता है। आज का श्रमिक वर्ग अथवा चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मनु की व्यवस्था के अनुसार शूद्र ही है। चाहे वह फिर किसी भी जाति या वर्ण का क्यों न हो।

 वर्ण विभाजन को शरीर के अंगों को माध्यम से समझाने का उद्देश्य उसकी उपयोगिता या महत्व बताना है न कि किसी एक को श्रेष्ठ अथवा दूसरे को निकृष्ट। क्योंकि शरीर का हर अंग एक दूसरे पर आश्रित है। पैरों को शरीर से अलग कर क्या एक स्वस्थ शरीर की कल्पना की जा सकती है ? इसी तरह चतुर्वण के बिना स्वस्थ समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

ब्राह्मणवाद की हकीकत :

ब्राह्मणवाद मनु की देन नहीं है। इसके लिए कुछ निहित स्वार्थी तत्व ही जिम्मेदार हैं। प्राचीन काल में भी ऐसे लोग रहे होंगे जिन्होंने अपनी अयोग्य संतानों को अपने जैसा बनाए रखने अथवा उन्हें आगे बढ़ाने के लिए लिए अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया होगा।

मनु तो सबके लिए शिक्षा की व्यवस्था अनिवार्य करते हैं। बिना पढ़े लिखे को विवाह का अधिकार भी नहीं देते, जबकि वर्तमान में आजादी के 70 साल बाद भी देश का एक वर्ग आज भी अनपढ़ है।
मनुस्मृति को नहीं समझ पाने का सबसे बड़ा कारण अंग्रेजों ने उसके शब्दश: भाष्य किए। जिससे अर्थ का अनर्थ हुआ। पाश्चात्य लोगों और वामपंथियों ने धर्मग्रंथों को लेकर लोगों में भ्रांतियां भी फैलाईं। इसीलिए मनुवाद या ब्राह्मणवाद का हल्ला ज्यादा मचा।
अंग्रेज जानते थे भारतीय सँस्कृति को खत्म करना है, तो मनु स्मृति खत्म करो । किसी देश को खत्म करना है तो उसका संविधान खत्म कर दो । अतः भारतीय सँस्कृति को खत्म करने हेतु अंग्रेजो ने मनु स्मृति दूषित कर खत्म कर दी।

मनुस्मृति या भारतीय धर्मग्रंथों को मौलिक रूप में और उसके सही भाव को समझकर पढ़ना चाहिए। विद्वानों को भी सही और मौलिक बातों को सामने लाना चाहिए। तभी लोगों की धारणा बदलेगी।
दाराशिकोह उपनिषद पढ़कर भारतीय धर्मग्रंथों का भक्त बन गया था। इतिहास में उसका नाम उदार बादशाह के नाम से दर्ज है। फ्रेंच विद्वान जैकालियट ने अपनी पुस्तक ‘बाइबिल इन इंडिया’ में भारतीय ज्ञान विज्ञान की खुलकर प्रशंसा की है।

पंडित, पुजारी बनने के लिये ब्राह्मण होना जरूरी है :

पंडित और पुजारी तो ब्राह्मण ही बनेगा, लेकिन उसका जन्मगत ब्राह्मण होना जरूरी नहीं है। यहां ब्राह्मण से मतलब विद्वान व्यक्ति से है न कि जातिगत।
 आज भी सेना में धर्मगुरु पद के लिए जातिगत रूप से ब्राह्मण होना जरूरी नहीं है बल्कि योग्य होना आवश्यक है।

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम।

क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च। (10/65)

महर्षि मनु कहते हैं कि कर्म के अनुसार ब्राह्मण शूद्रता को प्राप्त हो जाता है और शूद्र ब्राह्मणत्व को। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न संतान भी अन्य वर्णों को प्राप्त हो जाया करती हैं। विद्या और योग्यता के अनुसार सभी वर्णों की संतानें अन्य वर्ण में जा सकती हैं। #copy